Naukar se Chudai

नौकर से चुदाई - Part 1: घर की सेवा

नौकर से चुदाई - Part 1: घर की सेवा (पूर्ण संस्करण) मैं राधा हूँ, 32 साल की, एक अमीर परिवार की पत्नी। पति का नाम राज है - एक बड़ी कंपनी का सीईओ जो हमेशा व्यस्त रहता है। हमारा विवाह एक व्यवस्थित विवाह था - सुंदर, सिल्क, और खाली। मेरे घर में एक नौकर है - विजय, 25 साल का। वह बहुत कम बोलता है, लेकिन मैंने देखा है कि कैसे वह मेरी ओर देखता है जब वह सोचता है कि मैं नहीं देख रही हूँ। मेरे पति का काम ऐसा है कि वह महीनों बाहर रहता है - मुंबई, बैंगलोर, दिल्ली। घर में सिर्फ मैं, मेरी सास और विजय हैं। सास दिन भर अपनी फिल्मों और धार्मिक कार्यक्रमों में व्यस्त रहती है। शाम को सो जाती है। एक गर्मी की दोपहर, जब तापमान 42 डिग्री था, मैं अपने बेडरूम में था - पंखे के नीचे, बस एक नीली कुर्ती में। मेरे शरीर पर पसीना बह रहा था। मेरे पति का एक और संदेश आया: "रात को देर से आऊँगा। बहुत काम है।" मैंने फोन रख दिया। और फिर मैंने विजय के बारे में सोचा। उसकी मांसल बाहें जब वह घर की मरम्मत करता है। उसकी गहरी आँखें। उसका शांत चेहरा। "राधा जी, क्या चाय बना दूँ?" विजय की आवाज़ आई। वह दरवाज़े पर था, अपनी नज़र नीचे रखे हुए। "अंदर आ," मैंने कहा। वह अंदर आया, लेकिन दरवाज़े के पास खड़ा रहा। "मेरी कमर में दर्द है," मैंने कहा। "क्या तुम मसाज कर दो?" उसका चेहरा लाल हो गया। "राधा जी... यह... यह ठीक नहीं है।" "क्यों? तुम नौकर हो। यह तुम्हारा काम है।" "लेकिन... साहब..." "साहब बाहर हैं। तुम और मैं यहाँ अकेले हैं।" वह हिचकिचाया, लेकिन आ गया। मेरे बेड के पास बैठ गया। "यहाँ," मैंने कहा, अपने कुर्ती को थोड़ा ऊपर उठाते हुए। "मेरी पीठ पर।" उसके हाथ मेरी पीठ पर आए। मेरे शरीर में करंट दौड़ गया। उसके हाथ मजबूत थे, गर्म थे, और मेरी पीठ को एक नई तरीके से छू रहे थे। "और नीचे भी," मैंने कहा। उसके हाथ धीरे-धीरे नीचे चले गए - मेरी कमर पर, मेरे कूल्हों पर। मेरी सांसें तेज़ हो गईं। "राधा जी... यह ठीक नहीं है," विजय ने कहा, लेकिन उसके हाथ रुके नहीं। "मैं जानती हूँ," मैंने कहा। "लेकिन मैं तुम्हें चाहती हूँ।" मेरे शब्द हवा में तैरते रहे। विजय चुप हो गया। मैंने धीरे से पलट गई। मेरी आँखें उसकी आँखों से मिलीं। "क्या तुम भी... क्या तुम भी मुझे चाहते हो?" "राधा जी..." उसकी आवाज़ कराहती हुई थी। "बस एक बार। कोई को पता नहीं चलेगा।" उसने मेरे चेहरे की ओर देखा - मेरी खुली कुर्ती, मेरी भीगी त्वचा, मेरी आँखों में चाहत। और फिर... वह झुक गया। उसके होंठ मेरे होंठों पर आए। पहली किस गहरी, भरी हुई, महीनों की प्रतीक्षा से भरी थी। मैंने उसका चेहरा अपने हाथों में पकड़ लिया, उसे और करीब खींचते हुए। उसकी जीभ मेरी जीभ के साथ खेलने लगी। मेरे शरीर में एक अलग ऊर्जा जाग गई। "अगर कोई देख ले..." विजय ने कहा। "सब सो गए हैं," मैंने कहा, उसकी शर्ट को खींचते हुए। उसकी शर्ट उतर गई। उसकी छाती - काली, मांसल, मजबूत - मेरे सामने थी। मैंने अपना हाथ उसके ऊपर रखा। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। "क्या तुम सुरक्षित हो?" उसने पूछा। "हाँ," मैंने कहा। (मैं गर्भनिरोधक ले रही थी - बहुत समय से, मेरे पति के साथ कभी सेक्स न करने के कारण।) वह मुझे लिटा गया। मेरी कुर्ती पूरी तरह उतार दी। मैं पूरी तरह नंगी थी, उसके सामने। "तुम... तुम बहुत सुंदर हो," वह कहा, मेरे शरीर को देखते हुए। उसकी जीभ मेरे स्तनों पर आई। मेरे निप्पल तुरंत कठोर हो गए। मैं कराह गई। "हाँ... यहीं... प्लीज़," मैंने कहा। वह मेरे शरीर को धीरे से अन्वेषण किया - मेरी पेट पर चुंबन, मेरी जाँघों पर, मेरी पीठ पर। जब वह मेरी योनि पर पहुंचा, तो मैं पूरी तरह खुद को उसे समर्पित कर दिया। "मैं तुम्हें चाहता हूँ," वह फुसफुसाया। "और मैं तुम्हें," मैंने कहा। उसकी जीभ मेरे अंदर गहराई से चली। मेरी योनि उसके होंठों को चूमती रही। मैंने अपने हाथों को उसके बालों में डाला, उसे अपने अंदर खींचते हुए। "हाँ... वहीं... और गहरा," मैं चिल्लाती रही। मेरा शरीर एक तरंग में पहुंच गया। पहली बार, मैंने एक सच्चे आनंद का अनुभव किया। जब मैं शांत हुई, तो वह मेरे ऊपर आया। उसका लिंग मेरी योनि के द्वार पर था। "क्या तुम तैयार हो?" उसने पूछा। "हाँ," मैंने कहा। "पूरी तरह।" वह अंदर आया, और मैंने महसूस किया कि मैं पूरी तरह भरी हुई हूँ। उसका लिंग मेरी योनि को भरता गया - हर इंच मेरी चाहत को पूरा करता गया। "तुम कितनी सुंदर हो," वह बार-बार कहता रहा, मेरे कान को चूमते हुए। वह अंदर-बाहर करने लगा, एक धीमी, प्रेमपूर्ण गति से। हर थ्रस्ट मेरे अंदर एक नई जलन पैदा करता था। "और जोर से," मैंने विनती की। वह तेज़ हो गया। मेरे स्तन उसकी छाती से टकरा रहे थे। मेरी योनि उसके लिंग को निचोड़ रही थी। "मैं आ रहा हूँ," वह कहा। "मेरे अंदर," मैंने कहा। "प्लीज़ मेरे अंदर।" उसकी गति अनियंत्रित हो गई। उसका वीर्य मेरी योनि के अंदर भर गया। मेरा शरीर उसके साथ कांपा। उस पल में, मैं पूरी तरह से उसकी थी। और वह मेरा था। बाद में, जब हम बिस्तर पर लेटे थे, विजय ने कहा। "यह गलत था।" "नहीं," मैंने कहा, उसके सीने पर सिर रखते हुए। "यह सही था। पहली बार।" "अगर साहब को पता चल गया..." "नहीं चलेगा," मैंने कहा। "और अगर चल गया, तो मैं उसे छोड़ दूँगी।" विजय कुछ नहीं कहा। लेकिन उसके बाहों में मैंने महसूस किया कि वह मुझे चाहता है। सच में चाहता है।

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