Stranger se Chudai

अजनबी से चुदाई - Part 1: होटल की मुलाकात

अजनबी से चुदाई - Part 1: होटल की मुलाकात (पूर्ण संस्करण) मैं शीला हूँ, 30 साल की, एक अकेली महिला। मेरे पति का नाम सुरेश है - एक सफल बिजनेसमैन जो हमेशा किसी और की तरफ देखता है। हमारा विवाह एक खाली खोल बन गया है। मैं दिल्ली के एक पाँच सितारा होटल के बार में अकेली बैठी हूँ। मेरे पति शहर से बाहर है, फिर से। एक और कॉन्फ्रेंस। एक और बहाना। मेरे पास एक कोल्ड मार्टिनी है और मेरे पास दुनिया की सबसे अकेली भावना है। तभी एक आदमी बार के दूसरे ओर बैठा - मोटे काले बाल, ध्यान से लिखी गई आँखें, और एक उदास मुस्कुराहट। वह भी अकेला है। "यह जगह उदास लोगों के लिए है, लगता है," उसने कहा, मेरी ओर देखते हुए। "या शायद उदास लोग यहाँ आते हैं," मैंने कहा। "मैं आदित्य हूँ," वह कहा। "शीला।" वह मेरे पास बैठ गया। हमने सारी रात बातें कीं। वह अपनी विफल शादी के बारे में बोला - एक महिला जो उसके साथ नहीं रहना चाहती थी क्योंकि वह हमेशा काम में खोया रहता था। मैंने अपने बारे में बोला - एक आदमी जो मेरी अनदेखी करता है। "शायद हम दोनों को उस तरह प्यार की जरूरत नहीं है जिस तरह हमें दिया गया," उसने कहा। "तो किस तरह की जरूरत है?" मैंने पूछा। "अंतरंगता। किसी को महसूस करना। जानना कि हम मौजूद हैं।" मेरी आँखों में आँसू आ गए। "क्या तुम... क्या तुम मेरे साथ आना चाहते हो?" उसने पूछा। मैं जानती थी कि यह गलत है। लेकिन मैं अकेली थी। इतने लंबे समय से अकेली। "हाँ," मैंने कहा। होटल के कमरे में, आदित्य ने मुझे बिस्तर पर लिटाया। वह मेरे चेहरे को देखता रहा - जैसे वह हर अभिव्यक्ति को पढ़ना चाहता हो। "यह सिर्फ शारीरिक नहीं होगा," वह कहा। "मुझे पता है," मैंने कहा। उसकी जीभ मेरे होंठों पर आई। पहली किस गहरी, भरी, सच्ची थी। मेरा पूरा शरीर कांप गया। "तुम सुंदर हो," वह कहा, मेरे चेहरे के पास फुसफुसाते हुए। "मुझे बताओ मत। दिखाओ," मैंने कहा। वह मेरी किस के साथ शुरू किया। उसके होंठ मेरे गले पर, मेरे कंधों पर, मेरे स्तनों पर। उसकी जीभ मेरी नाभि पर, मेरी जाँघों पर। जब वह मेरी योनि पर पहुंचा, तो मेरा शरीर एक अलग भाषा में बोलने लगा। "हाँ... वहीं... बस वहीं," मैं कहती रही, अपनी पीठ को मेहराब में झुकाते हुए। उसकी जीभ मेरे अंदर गहराई से चली। वह हर गड़ी को खोज रहा था, हर संवेदना को समझ रहा था। "तुम कितनी मीठी हो," वह कहा, मुझे चाटते हुए। मेरी योनि उसके होंठों को पूजा करने लगी। मेरा शरीर एक तरंग में पहुंच गया। "मैं आ रही हूँ," मैंने चेतावनी दी। "आ जाओ," उसने कहा। "मेरे लिए आ जाओ।" मेरा शरीर विस्फोट हो गया। मैंने उसकी पकड़ को कसा, उसे मेरे अंदर खींचते हुए। जब मैं शांत हुई, तो वह मेरे ऊपर आया। उसकी आँखें मेरी आँखों में थीं। "क्या तुम ठीक हो?" उसने पूछा। "पहली बार खुश हूँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में सच्चाई थी। उसका लिंग मेरी योनि में प्रवेश किया - धीरे, सावधानी से। हर गति में प्यार था। "तुम मेरी हो," वह कहा। "और तुम मेरे हो," मैंने कहा। हमने पूरी रात एक-दूसरे को प्यार किया। कई बार, कई तरीकों से। लेकिन हर बार, यह केवल शारीरिक नहीं था। यह दो टूटे हुए लोगों को एक दूसरे में पूरे होने का अनुभव था। सुबह, जब सूरज निकला, आदित्य ने कहा। "मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा।" "मैं भी नहीं जाऊँगी," मैंने कहा। और पहली बार, मुझे लगा कि मैं घर पा गई हूँ।

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